₹91,000 करोड़ का Tata-PSMC सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट: धोलेरा से शुरू होगी भारत की पहली चिप क्रांति

गुजरात के धोलेरा में बन रहा Tata-PSMC सेमीकंडक्टर फैब प्लांट

गुजरात के Dholera Special Investment Region में TATA Electronics और Powerchip Semiconductor Manufacturing Corporation (PSMC) मिलकर भारत का पहला बड़ा कमर्शियल सेमीकंडक्टर फैब प्लांट बना रहे हैं। इस प्रोजेक्ट में करीब ₹91,000 करोड़ का निवेश किया जा रहा है। प्लांट में 28 nm से 110 nm तक की चिप्स बनाई जाएंगी और इसकी उत्पादन क्षमता 50,000 वेफर प्रति माह होगी। उम्मीद है कि इस फैक्ट्री से 2026 के अंत तक पहली “Made in India” चिप तैयार हो जाएगी। इस मेगा प्रोजेक्ट से लगभग 21,000 लोगों को सीधे रोजगार मिलेगा, जबकि हजारों अप्रत्यक्ष नौकरियां भी पैदा होंगी।

धोलेरा: जहाँ बन रहा है भारत का टेक फ्यूचर

Dholera Special Investment Region आज भारत के सबसे बड़े टेक मिशन का केंद्र बन चुका है। यहाँ TATA Electronics और ताइवान की Powerchip Semiconductor Manufacturing Corporation (PSMC) मिलकर करीब ₹91,000 करोड़ की लागत से भारत का पहला बड़ा सेमीकंडक्टर फैब प्लांट बना रहे हैं।

यह प्रोजेक्ट लगभग 50,000 वेफर प्रति माह उत्पादन क्षमता के साथ तैयार किया जा रहा है। अनुमान है कि इससे सीधे तौर पर करीब 21,000 नौकरियाँ पैदा होंगी, जबकि अप्रत्यक्ष रोजगार इससे कहीं ज्यादा होंगे।

इस फैब में 28nm, 40nm, 55nm, 90nm और 110nm टेक्नोलॉजी नोड्स पर चिप्स तैयार की जाएंगी।

लोग 3nm की बात कर रहे हैं, भारत 28nm क्यों बना रहा है?

सोशल media पर कई लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि जब दुनिया 3nm और 2nm जैसी अत्याधुनिक चिप्स बना रही है, तो भारत 28nm जैसी पुरानी टेक्नोलॉजी पर क्यों फोकस कर रहा है?

लेकिन असली कहानी यहीं से शुरू होती है।

सच्चाई यह है कि दुनिया की लगभग 70% सेमीकंडक्टर जरूरतें आज भी 28nm और उससे ऊपर के नोड्स पर आधारित हैं। जबकि 3nm जैसी cutting-edge chips का हिस्सा सिर्फ करीब 3% है।

यानी हेडलाइंस भले 3nm बनाती हों, लेकिन दुनिया की अर्थव्यवस्था अभी भी 28nm पर चलती है।

28nm और उससे ऊपर की चिप्स का इस्तेमाल सबसे ज्यादा इन सेक्टर्स में होता है:

  • इलेक्ट्रिक वाहन (EVs)
  • ऑटोमोबाइल माइक्रोकंट्रोलर
  • पावर मैनेजमेंट सिस्टम
  • 5G टेलीकॉम नेटवर्क
  • इंडस्ट्रियल मशीनें
  • डिस्प्ले टेक्नोलॉजी
  • सेंसर और एम्बेडेड डिवाइसेज
  • डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स

यानी भारत ने वही चिप्स बनाने का फैसला किया है जिनकी उसे सबसे ज्यादा जरूरत है।

ASML की एंट्री ने दुनिया का ध्यान क्यों खींचा?

16 मई 2026 को प्रधानमंत्री Narendra Modi नीदरलैंड्स के शहर वेल्डहोवन पहुंचे, जहाँ उन्होंने ASML और Tata Electronics के बीच हुए रणनीतिक समझौते को देखा।

ASML दुनिया की इकलौती कंपनी है जो Extreme Ultraviolet Lithography (EUV) मशीनें बनाती है। यही मशीनें आधुनिक चिप निर्माण की रीढ़ मानी जाती हैं।

इन मशीनों की कीमत इतनी ज्यादा होती है कि एक हाई-NA EUV स्कैनर लगभग 380 मिलियन डॉलर का होता है। इसका वजन दो Boeing 777 विमानों जितना होता है और इसे इंस्टॉल करने में महीनों लग जाते हैं।

हालांकि धोलेरा प्लांट शुरुआती चरण में EUV आधारित 3nm चिप्स नहीं बनाएगा, लेकिन ASML की भागीदारी यह साबित करती है कि भारत अब वैश्विक सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम में गंभीर खिलाड़ी बन चुका है।

भारत ने आखिर 28nm से शुरुआत क्यों की?

कई टेक एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत को सीधे 7nm या 3nm टेक्नोलॉजी की तरफ जाना चाहिए था। लेकिन इतिहास कुछ और कहता है।

TSMC ने भी शुरुआत 3 माइक्रोन टेक्नोलॉजी से की थी और 3nm तक पहुँचने में उसे करीब 35 साल लगे।

इसी तरह चीन की SMIC ने 180nm से शुरुआत की और कई अरब डॉलर की सरकारी मदद के बाद धीरे-धीरे आगे बढ़ी।

सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री कोई overnight success नहीं होती। यह दशकों की मेहनत, सप्लाई चेन, रिसर्च और अनुभव का खेल है।

भारत ने इस बार जल्दबाजी के बजाय practical approach चुनी है।

2021 की चिप की कमी ने भारत को क्या सिखाया?

कोरोना महामारी के दौरान पूरी दुनिया में chip shortage पैदा हो गई थी। इसका सबसे बड़ा असर ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री पर पड़ा।

Maruti Suzuki जैसी कंपनियों को production घटाना पड़ा। भारतीय ऑटो इंडस्ट्री को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

दिलचस्प बात यह है कि यह संकट 3nm चिप्स की कमी की वजह से नहीं, बल्कि 28nm से 90nm माइक्रोकंट्रोलर चिप्स की कमी के कारण पैदा हुआ था।

आज एक आधुनिक कार में 1400 से लेकर 3000 तक चिप्स इस्तेमाल होती हैं। EVs और स्मार्ट वाहनों के बढ़ते दौर में यह जरूरत और बढ़ने वाली है।

इसीलिए भारत ने mature-node chips पर फोकस किया है।

धीरे-धीरे तैयार हो रहा है पूरा इकोसिस्टम

पहले भारत में कई semiconductor projects की घोषणा हुई, लेकिन वे सफल नहीं हो पाए क्योंकि उनके आसपास सपोर्टिंग ecosystem नहीं था।

इस बार तस्वीर अलग है।

गुजरात के साणंद में Micron Technology का ATMP प्लांट शुरू हो चुका है। यहाँ chips की packaging और testing का काम हो रहा है।

इसके अलावा:

  • CG Power–Renesas
  • Kaynes Semicon
  • Tata की OSAT सुविधाएँ

भी तेजी से ecosystem मजबूत कर रही हैं।

यानी जब धोलेरा की पहली wafer बाहर आएगी, तब उसे absorb करने के लिए पूरा supply chain ecosystem पहले से तैयार होगा।

गुजरात क्यों बन रहा है भारत का ‘Semiconductor Hub’?

आज भारत में semiconductor investments का सबसे बड़ा केंद्र गुजरात बन चुका है।

इसके पीछे कई कारण हैं:

  • सरकार की semiconductor-friendly policy
  • लगातार बिजली और पानी की व्यवस्था
  • ports और logistics connectivity
  • world-class industrial infrastructure
  • fast approvals और policy support

धोलेरा को future smart industrial city के तौर पर विकसित किया जा रहा है, जहाँ आने वाले वर्षों में कई global tech companies निवेश कर सकती हैं।

चुनौतियाँ अभी भी कम नहीं हैं

हालांकि यह रास्ता आसान नहीं होगा।

सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री दुनिया की सबसे कठिन manufacturing industries में गिनी जाती है।

एक फैब प्लांट को चाहिए:

  • 24×7 uninterrupted power supply
  • लाखों लीटर ultra-pure water
  • highly skilled engineers
  • expensive equipment
  • stable supply chain

इसके अलावा चीन भी 28nm मार्केट में भारी निवेश कर रहा है और aggressive pricing strategy अपना रहा है।

लेकिन भारत के पास एक बड़ा geopolitical advantage है।

अमेरिका और पश्चिमी देशों ने चीनी semiconductor imports पर restrictions बढ़ा दिए हैं। ऐसे में दुनिया को trusted alternative manufacturing hub चाहिए — और भारत उसी जगह खुद को स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।

निष्कर्ष: भारत ने आखिरकार सही शुरुआत कर दी है

कई लोग सिर्फ 3nm और 2nm जैसी flashy technology देखकर प्रभावित हो जाते हैं। लेकिन असली समझदारी वही होती है जो market demand और ground reality को समझे।

धोलेरा का 28nm फैब शायद दुनिया का सबसे advanced semiconductor plant नहीं होगा, लेकिन यह भारत की जरूरतों के हिसाब से सबसे practical और strategic शुरुआत जरूर है।

हर बड़ी semiconductor superpower ने शुरुआत छोटे कदम से ही की थी।

भारत ने भी आखिरकार वह पहला कदम उठा लिया है।

और हो सकता है आने वाले 20–30 वर्षों में यही कदम भारत को दुनिया के सबसे बड़े टेक मैन्युफैक्चरिंग देशों में शामिल कर दे।

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